चिड़ियों की चहचाहट और उन्मुक्त उडान देख लग रह था मानो आसमान भी संतरंगी हो गया है। दिल तो किया कि काश चिडिया ही बनाया होता भगवान ने। तभी दूर से आवाज आई धाँय - धाँय।
चहचाहट और बढ़ गयी। लेकिन अब इसमें एक कर्कशता थी। उड़ान उन्मुक्त न होकर भययुक्त लगने लगा। चिड़िया बनने का भाव अब दया भाव मे बदलने लगा था। आसमान रंगीन न होकर स्याह दिखने लगा।
मैं मौन हो कर इस भावनात्मक परिवर्तन को देख रहा था। तभी पीछे से आवाज आई...
" यार मुकुल वो देख चिड़ियां के झुण्ड को। कितनी स्वछन्द उड़ती है आसमां मे। लगता है सतरंगी ख़्वाबों को उड़ायें जा रहीं है। "
मैं मन ही मन बोला " शायद इसने धाँय - धाँय की आवाज नही सुनीं। "