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डूग डूग डुग ....डूग डूग डुग ...

डूग डूग डुग ....डूग डूग डुग ...
ये आवाज सुनते ही  तीर की तरह लपकते हुए हम  बाहर पहुँच जाते थे ...

"ऐ सुखिया एगो २ टकिया बरफ दे ना "
"पहिले  कल वाला पैसा मलकिनी से मांग के दीजिये "
"अरे धीरे बोलो माँ सुनेगी तो मारेगी "
"देखिये हम ऐसे फीरी में बरफ नहीं बांटते  है…जाईये आज नहीं मिलेगा ..."
पांच मिनट तक मिन्नत करने के बाद ... भारी क़दमों से जब  वापस जाने लगते तो .. पीछे से हर बार की तरह आवाज सुनाई  देती थी,
"आईये ...लेकिनि आखिरी बार ही दे रहे हैं ...कल से उधार नहीं मिलेगा ..."

आज भी जब किसी आइस  क्रीम पार्लर में जाता हूँ सोचता हूँ कही से सुखीया के डमरू की आवाज आएगी शायद ...
डूग डूग डुग ....डूग डूग डुग ...







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