ये जिजीविषा ही थी जिसने एक पांच वक़्त के नमाजी को हिन्दू बनने पर मजबूर कर दिया। दो ही रास्ते थे या तो हिन्दू बन जाओ या फिर पुरुखों की इस मिटटी में अपने अपने तमाम यादो को दफ़न कर पाकिस्तान चले जाओ। यूँ तो वो न ही अपने मकान को बचा सके, न ही अपने परिवार को और ना ही अपने उस गाँव को । जालिमों ने सरहद पार के जुल्म का बदला उनके छोटे से गाँव को जला कर ले लिया था. अपने बेजान से जिस्म को बचाकर किसी तरह दिल्ली ले आये। नाम तो वही था बस उपनाम बदल लिया था उन्होंने इकबाल मोहम्मद से इकबाल चंद हो गये. जिस घर में ठहरे थे उसी घर की एक बाल विधवा से विवाह कर फिर से परिवार बसा लिया।पहले के सच को एक कुरान शरीफ के साथ बंद कर एक बक्से में रख दिया।आज जब आखिरी साँसे गिन रहे थे उनसे रहा नहीं गया . बेटे से वो छोटा बक्सा मंगवाया जो सबके लिए कौतुहल का विषय था लेकिन आज तक जिसके बारे में किसी को कुछ नहीं पता था। कांपते हाथों से चुचाप उसमे से कुरान शरीफ निकाला। पहले आँखों में फिर सर पे लगाया । पूरे शरीर में एक कम्पन सी हुई फिर आँखें बंद हो गयी । धीरे धीरे सार शरीर सुन्न पड़ गया था ।
~ प्रवीण ~
~ प्रवीण ~
