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पंखुड़ी जमीन पर

ऋतुराज के आने से सब कुछ बदल सा गया था। अक्सर छुपा रहने वाला सूरज अपनी नरमी बिखेर रहा था.। शीतल मलय इसके संपर्क में आके थोड़ी सी उष्ण हो चुकी थी.।  भ्रमर पुष्पपरागपान से उन्मत्त हो कर स्वरलाहिरी बिखेर रहे थे.। पुष्प अपना पराग लुटा कर  भी अति मनहर प्रतीत हो रहे थे । सब कुछ इतना मनोरम था जैसे श्रृष्टि अपनी यौवनावस्था में फिर से प्रवेश कर गयी हो। लेकिन इन सबके बीच में उपवन में बैठा देवपुरुष  सदृश  नवयुवक की दृष्टि  कही अटक सी गयी थी...एक गुलाब के पुष्प पर । निस्संदेह उस वाटिका का सबसे सुन्दर पुष्प  था वो । पुष्प को देख युवक मुग्ध सा हो गया था। लेकिन धीरे धीरे एक अकुलाहट सी आ गयी उसके मन में । मोहपाश में बंधकर वो पास आ गया उस पुष्प के. . अकुलाहट और बढ़ गयी ...स्पर्शातुर हाथ बढ़ गये उस पुष्प की ओर, अब अकुलाहट अपने चरम पर थी...उन्मत्त सा हो गया था युवक । जाने क्या हुआ उसने तोड़ दिया उस पुष्प को ।

अचानक एक मर्मभेदी आह सी निकली.... भ्रमरों का गान कर्कश हो गया ...सूर्य कुछ शर्मसार सा हो के बादलों में छुपने लगा....हवा में भी एक पैनी शीतलता आ चुकी थी...युवक अप्रतिभ सा, सन्न सा खड़ा था....  हाथ में पड़ा पुष्प अजीब प्रतीत हो रहा था उसे ..अचानक युवक ने पुष्प  की पंखुड़ियों को हटाना शुरू किया...शायद अपने आकर्षण के केंद्र को ढूंढ रहा था...कुछ देर में सारी  पंखुड़ी जमीन पर बिखरी पड़ी थी...पंखुड़ी विहीन पुष्प को हाथ में ले कर युवक एक अजीब सी वितृष्णा से भरने लगा था....दूर से रात अपनी कालिमा समेटे तीव्रता से आ रही थी ।  

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मूर्तिकार

मूर्तिकार की व्यस्तता बता रही थी की दुर्गा पूजा काफी नजदीक आ चुकी है। महिषासुर और माता की अनेकों मूर्तियाँ विभिन्न आकर और रूपों में पड़ी थी। लेकिन एक मूर्ति कुछ ज्यादा ही भव्य बनके उभर रही थी। मूर्तिकार भी इधर उधर मिटटी चढ़ा के उसे और सुन्दर बनाने में लगा था। बीच बीच में आत्म मुग्ध होकर काफी देर तक निहारता भी रहता उस मूर्ति को।  रात हो चुकी थी। दिन भर के थकान को भूल अपनी ही धुन में लगा पड़ा था। जाने कब नींद आ गयी उसे। अचानक सपने में उसे वही मूर्ति मुस्कुराती नजर आई। सम्मोहित सा  खड़ा रहा वो। मूर्ति की मुस्कान और भी गहरी हो गयी। एक विचित्र सी आभा फैलने लगी चहुओर। घंटियों और शंखों की आवाज आने लगी ,अगरबत्ती और धूप का धुंआ जैसे फ़ैल गया था। फिर अचानक एक सैलाब आया पानी का। वो मूर्ती अब डूब रही थी, उसके रंग पानी में घुलने लगे थे। घंटियों और शंखों की आवाज और तेज़ हो गयी थी। देखते ही देखते मूर्ती गायब हो गयी। मूर्तिकार सपने में रोने लगा। फिर उसे लगा कोई उसके आंसू पोछ रहा है। गौर से देखा , अरे ये तो माँ है....जगत जननी नहीं बल्कि उसकी जननी।

~ एक झूठी सी आशा ~

जंग लगे उस ताले की चाभी बहुत पहले खो चुकी थी। कुछ प्रयास हुआ उस ताले को तोड़ने का और चाभी ढूंढने का भी । पर शायद किसी के बस में नहीं था कि वर्षों से लगा वो ताला खुल जाए। लेकिन कुदरत की कुछ और ही चाह थी। जाने कहाँ से एक पौधा पनप गया था उस ताले में। अब एक संघर्ष था उस बेरंग ताले और खूबसूरत पौधे के बीच। संघर्ष अपने अस्तित्व बचाने की। ताले के जंग ने पौधे के जड़ को खाने की बहुत कोशिश की। लेकिन हर कहानी की तरह इस बार भी जीत अच्छाई की हुयी, ताला टूट गया। कश्मीर से आतंकवाद का ताला टूट चूका था, बुरहान वानी जैसे कितने जंग के छोटे - छोटे टुकड़े मिटटी में दफ़न हो गए थे, शांति की हरियाली धरती के जन्नत में एक बार फिर से फ़ैल गई थी।

गुरु-शिष्य परंपरा

" आज -कल वो गुरु-शिष्य परंपरा नहीं रही "- कहते हुए डॉ रमनन ने सिगरेट सुलगाई ... अब छात्रों से वो इज्जत कहा मिलती है teachers को ....! '' Sir Time has changed ..अब छात्र विद्या अर्जन करने नहीं बल्कि खरीदने आते हैं " " Yes Mohit - खैर मुझे क्या करना है इन बातों का .....Forget those things ...अब ये teachers का जो खम्भा बचा है उसे भी तो ख़तम करना है .... " मोहित आज्ञाकारी छात्र की तरह तन्मयता से गुरु आज्ञा पालन में लग गया ........