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लेकिन बेटा ये जश्न ना मनाया जाता है हमसे

बात उन दिनों की है जब मैं पंजाब में अपने इंजीनियरिंग के पहले वर्ष में था ..दिन १५ अगस्त का था ...लेकिन बहुत अजीब लग रहा था ...सुबह सुबह चाय पीने कैंटीन पंहुचा तो जगतार सिंह जी दिख गये ...८० साल का सरदार..लेकिन अभी भी दुरुस्त दिखते थे ...
"चाचा मुझे तो लगता ही नही की आज १५ अगुस्त है ..कही कोई उत्साह ही नही दिख रहा ...हमारे यहाँ तो सुबह से लाउडस्पीकर पर देशभक्ति के गाने बजने लगते ...प्रभात फेरी झंडोत्तोलन और ...मुझे तो लगता ही नहीं की ये वही पंजाब है जिसने सबसे ज्यादा देशभक्त पैदा किये हैं ..भगत सिंह , लाला लाजपत राय..."
कुछ देर चुचाप सुनने के बाद वो बोले:-
"ओये पुत्तर , जिस आजादी के लिए अपने लाल कुर्बान किये इस पंजाब ने उसी आजादी ने इस पंजाब के दो टुकड़े कर दिए ...अपने ही घर में इधर से उधर भगाया गया लोगों को ... मार, काट, बलात्कार ...और ८४ का वो दंगा उसके भी बीज तो इसी आजादी ने ही डाले थे... देश के लिए आज भी जान देने की बारी आये तो सबसे आगे पंजाबी ही होंगे ...लेकिन बेटा ये जश्न ना मनाया जाता है हमसे ..."
कहते कहते अजीब सा चेहरा हो गया था उनका...!!!

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मूर्तिकार

मूर्तिकार की व्यस्तता बता रही थी की दुर्गा पूजा काफी नजदीक आ चुकी है। महिषासुर और माता की अनेकों मूर्तियाँ विभिन्न आकर और रूपों में पड़ी थी। लेकिन एक मूर्ति कुछ ज्यादा ही भव्य बनके उभर रही थी। मूर्तिकार भी इधर उधर मिटटी चढ़ा के उसे और सुन्दर बनाने में लगा था। बीच बीच में आत्म मुग्ध होकर काफी देर तक निहारता भी रहता उस मूर्ति को।  रात हो चुकी थी। दिन भर के थकान को भूल अपनी ही धुन में लगा पड़ा था। जाने कब नींद आ गयी उसे। अचानक सपने में उसे वही मूर्ति मुस्कुराती नजर आई। सम्मोहित सा  खड़ा रहा वो। मूर्ति की मुस्कान और भी गहरी हो गयी। एक विचित्र सी आभा फैलने लगी चहुओर। घंटियों और शंखों की आवाज आने लगी ,अगरबत्ती और धूप का धुंआ जैसे फ़ैल गया था। फिर अचानक एक सैलाब आया पानी का। वो मूर्ती अब डूब रही थी, उसके रंग पानी में घुलने लगे थे। घंटियों और शंखों की आवाज और तेज़ हो गयी थी। देखते ही देखते मूर्ती गायब हो गयी। मूर्तिकार सपने में रोने लगा। फिर उसे लगा कोई उसके आंसू पोछ रहा है। गौर से देखा , अरे ये तो माँ है....जगत जननी नहीं बल्कि उसकी जननी।

~ एक झूठी सी आशा ~

जंग लगे उस ताले की चाभी बहुत पहले खो चुकी थी। कुछ प्रयास हुआ उस ताले को तोड़ने का और चाभी ढूंढने का भी । पर शायद किसी के बस में नहीं था कि वर्षों से लगा वो ताला खुल जाए। लेकिन कुदरत की कुछ और ही चाह थी। जाने कहाँ से एक पौधा पनप गया था उस ताले में। अब एक संघर्ष था उस बेरंग ताले और खूबसूरत पौधे के बीच। संघर्ष अपने अस्तित्व बचाने की। ताले के जंग ने पौधे के जड़ को खाने की बहुत कोशिश की। लेकिन हर कहानी की तरह इस बार भी जीत अच्छाई की हुयी, ताला टूट गया। कश्मीर से आतंकवाद का ताला टूट चूका था, बुरहान वानी जैसे कितने जंग के छोटे - छोटे टुकड़े मिटटी में दफ़न हो गए थे, शांति की हरियाली धरती के जन्नत में एक बार फिर से फ़ैल गई थी।

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" आज -कल वो गुरु-शिष्य परंपरा नहीं रही "- कहते हुए डॉ रमनन ने सिगरेट सुलगाई ... अब छात्रों से वो इज्जत कहा मिलती है teachers को ....! '' Sir Time has changed ..अब छात्र विद्या अर्जन करने नहीं बल्कि खरीदने आते हैं " " Yes Mohit - खैर मुझे क्या करना है इन बातों का .....Forget those things ...अब ये teachers का जो खम्भा बचा है उसे भी तो ख़तम करना है .... " मोहित आज्ञाकारी छात्र की तरह तन्मयता से गुरु आज्ञा पालन में लग गया ........