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मुबीन !

मुबीन ! ये नाम पहली बार कब सुना याद नहीं पर मुबीन कहता था कि "मालिक आपका पहला मुंडन (तब  मैं करीब २.५ साल का था ) मैंने  ही किया था और तो और आपके पिताजी का भी"। कहते कहते एक अधिकार भाव झलकने लगता था उसके चेहरे पर.। मुबीन हज्जाम था हमारे गॉंव का.। पहले आज कि तरह सलून नहीं होते थे गॉंवों में ...। बाबा कहते थे कि हमने भी कुछ जमीन दिया है इसको और गांव  के कुछ और लोगों ने भी दिया है। बाकी लोग या तो कुछ चावल गेंहू दे देते थे  या फिर कुछ तो मुफ्त में ही बना के निकल लेते थे .। फिर भी कभी उसके चेहरे पे कोई शिकन नही दिखी। हमेशा मुस्कुराता रहता था.। याद है  जब बहुत सालो बाद गावं गए तो अचानक से मुबीन बिदक गया था मेरे सफाचट मूंछ दाढ़ी को देख कर। बोलने लगा मालिक आप लोग तो मेरा सगुन का धोती और बख्शीश  मार लिए। बाद में पता चला की पहले दाढ़ी बनाने पर उसे ये सब मिलता। अब उसके पिचके गालों पर उभरी गुस्से की रेखा को देख अफ़सोस होने लगा था। खैर बात आई और  गयी। लेकिन इस बार जब गावं गया तो अचानक से याद आ गया वो। चौक पर खुले नए सलून में दाढ़ी बनाते बनाते पूछ बैठा उसके बारे में।

"मालिक मुबीन ता सठिया गया है। केतना बार ओकरा  सब बोला है सलून में काम कर लो। लेकिन उ ता आज भी चमरा में अस्तुरा लपेट के बौआता रहता है गावं में। जाने क्या तसल्ली मिलती है ऊके। "
अब तो और इच्छा होने लगी थी उससे मिलने की।  पूछते पूछते उसके घर पहुंचा। अचानक से दिखा मुबीन।  हाल चाल होने के बाद मैं कह बैठा
" दाढ़ी नहीं बना दोगे मुबीन "
"अरे मालिक पर आप तो सफाचट हैं। जब बढ़ेगा तो बनवा लीजियेगा। "
"नहीं अभी बना दो। कल जा रहा हूँ गावं से। फिर पता नहीं कब लौटूं "
अब मुबीन किसी घटिया क्रीम को मेरे गाल पर रगड़ रहा था।  लेकिन एक अजीब सा आनंद मुझे आ रहा था।  जो मुबीन के टूटे फ्रेम के अंदर धंसी हुयी आँखों में भी दिख रहा था।

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