साहेब बेहद संजीदगी और अपनेपन से मिल रहे थे दंगा पीड़ितों से। लोग भी भावुक हो कर रो रो कर बता रहे थे अपने दर्द को। बताएं भी क्यूँ नही इतना बड़ा आदमी उनके बीच कहाँ आता है। पूरे दिन झुग्गियों में भटकने के बाद जब रात को साहेब अपनी बी एम डब्ल्यू में अपने बंगले कि तरफ प्रस्थान कर रहे थे तो एक ही बात उनके दिमाग में घूम रही थी -"हर एंगल से देख लिया, काफी कंटेंट जमा कर लिया है बस अब ये सोचना है कि इस कंटेंट को बेचा कैसे जाए.।"
" आज -कल वो गुरु-शिष्य परंपरा नहीं रही "- कहते हुए डॉ रमनन ने सिगरेट सुलगाई ... अब छात्रों से वो इज्जत कहा मिलती है teachers को ....! '' Sir Time has changed ..अब छात्र विद्या अर्जन करने नहीं बल्कि खरीदने आते हैं " " Yes Mohit - खैर मुझे क्या करना है इन बातों का .....Forget those things ...अब ये teachers का जो खम्भा बचा है उसे भी तो ख़तम करना है .... " मोहित आज्ञाकारी छात्र की तरह तन्मयता से गुरु आज्ञा पालन में लग गया ........
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