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ओस की बूंदें

सुखिया आज सो नहीं पा रहा था। खेत मे फसल पड़ी थी और आसमान में बेमौसम मेघ ने डेरा जमा लिया था। दिन भर की मेहनत से शरीर थक के चूर हो गया था। पलकों पर नींद का बोझ उठाये अँधेरे में बार बार आसमान की ओर देख रहा था। मानो एक फ़रियाद कर रहा हो मेघ से। लेकिन तभी बिजली कड़की जोर से। और लगा मानो आसमान के साथ साथ किसानों का भी सीना फट गया हो। उसे लगा कि बाहर का अँधेरा बिलकुल उसके जीवन के अँधेरे की तरह है। फिर जाने कब आँख लग गयी। नींद में सुखिया ने एक भयानक सपना देखा। वो फसल को काट रहा है और लेकिन हर पौधे से खून टपक रहा है। गाढ़ा लाल खून। उसने जल्दी जल्दी और फसल को काटना शुरू किया। चारो तरफ खून ही खून। एक सैलाब सा मानो। सुखिया उस खून के दल दल में डूबने लगा। अचानक उसकी आँख खुली। वो पसीने से लथपथ था। बाहर देखा तो सुबह हो चुकी थी। आसमान साफ़ था। भागा खेत की तरफ। दूर से नजर आया गेंहू के पौधे पर ओस की बूंदें चमक रही थी। सुखिया ने ऊपर देखा आसमान की तरफ। मानो शुक्रिया कह रहा हो।

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